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औड़िहार का नाम पहले हूणहार था

 पूर्वांचल में भेड़िया को हुणार कहा जाता है । हुणार शब्द की व्युत्पति हूण शब्द से हुआ है । हूण एक बर्बर जाति थी , जो कि बहुत लड़ाकू थे । वे जिस देश पर आक्रमण करते थे , उस देश का समूल विनाश करके छोड़ते थे । वे उस देश के बच्चों तक को भी जीवित नहीं छोड़ते थे । उन्हें भी मार देते थे । भेड़िया भी बच्चों को उठाकर ले जाते थे । इसलिए पूर्वांचल में भेड़िए हुणार कहे जाने लगे । माताएं रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए कहा करतीं थीं - चुप हो जाओ , बरना हुणार आ जाएगा । बनारस के नजदीक गाजीपुर जनपद का औड़िहार नगर स्थित है । यहीं पर पाटलिपुत्र का राजा स्कंद गुप्त ने आगे बढ़कर हूणों का सामना किया था । जब वह हूणों से समर ले रहा था तब उसके पिता कुमार गुप्त मृत्यु शय्या पर थे । दुःखी मनःस्थिति में होते हुए भी स्कंदगुप्त ने हूणों से डटकर लोहा लिया था । वह युद्ध भूमि में जमीन पर सोता था । सेना राजा को अपने बीच पाकर एक नयी ऊर्जा से लवरेज थी । दो लाख की हूण सेना को गाजर मूली की तरह काटकर फेंक दिया था स्क॔दगुप्त की सेना ने । उसके पास चतुरंगिणी सेना थी । हूण हार गये थे । इसलिए इस जगह का नाम " हूणहार " रखा ...

हाथ का साथ हमेशा रहना चाहिए

 बहुत से लोगों ने हाथ धोना सीख लिया है । इस सीख में कोरोना का हाथ है । लोग हाथ धोने के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं । इस हाथ धोने में हाथ के साथ साथ पानी और साबुन का भी बंटाधार हो रहा है । 24 घंटे में केवल 8 घंटे हीं हाथ को आराम मिलता है । वह भी तब जब हम सो रहे होते हैं । कहते हैं कि जल हीं जीवन है । इस जीवन को हम हाथ धोकर बरबाद कर रहे हैं । साबुन और सेनेटाइजर्स का खर्चा अलग से हो रहा है । हाथ न धोने पर घर वाले हीं आड़े हाथों ले लेते हैं । उनका कहना है कि जान से हाथ धोने से बेहतर है हाथ धोना । कोरोना काल में लोगों ने हाथ मिलाना भी बंद कर दिया है । गले मिलना तो दूर की बात है । अभी पिछले महीने सेवानिवृत्त अधिकारियों की मीटिंग थी । अधिकांश अधिकारी कुहनी मिला रहे थे । कुछ मुक्के से मुक्का मिला रहे थे । कोरोना काल में कुछ कांग्रेसी भाजपा में जा मिले हैं । वे भी हाथ नहीं मिला रहे हैं । डर तो कोरोना का है , पर बहाना है कांग्रेस के चुनाव चिन्ह हाथ का । उनका कहना है कि हाथ मिलाने से उन्हें कांग्रेस के हाथ की याद आ जाती है ।  कोरोना काल में पेट्रोल का दाम सौ पार कर गया है । सरकार ने हाथ खड़े ...

हब्शियों की दुनियां भारत में

 हब्शियों को भारत में सबसे पहले अरबी लोगों ने लाया था । यहाँ ये बतौर गुलाम लाए गये थे । हब्शी फारसी का शब्द है , जो अबीसीनिया से बना है । अबीसीनिया एक जगह है , जो हब्शियों का मूल स्थान है । अबीसीनिया से अब्सी बना और फिर यही अब्सी हब्शी में तब्दील हो गया । अरबी लोगों के बाद ब्रिटिशर्स और पुर्तगाली भी पीछे नहीं रहे । वे भी हब्शियों को बतौर दास भारत लाए थे । कुछेक हब्शी नाविक , भाड़े के सैनिक और व्यापार करने के नियत से भी भारत आए थे । अधिकांश हब्शी पूर्वी अफ्रीका से आए थे । ये बंतू समाज के लोग थे । ये हब्शी भारत में आकर भारत के हीं हो गये । वे कभी भी लौटकर अपने मुल्क नहीं गये । 18 वीं और 19 वीं शताब्दी के मध्य जब दास प्रथा का समापन हुआ तो ये भागकर भारत के जंगलों में जा छुपे । वे यहाँ रहकर शेष भारत से कटे कटे रहे ।ये मेहनत मजूरी कर अपना पेट पालन करते रहे ।  भारतीय हब्शियों को सिद्दी नाम से जाना जाता है । सिद्दी शब्द सैय्यद से लिया गया है । चूँकि सर्वप्रथम इनको भारत लाने वाले अरबी सैय्यद थे , इसलिए उनके दास भी सैय्यद की तर्ज पर सिद्दी कहलाए । सातवीं सदी से इनको गुलाम बनाकर भारत में ...

ब्रिटिश राजघराने की रवायतें अभी नहीं बदली हैं ।

 मेगन मार्केल के पिता काकेशियन प्रजाति के थे । मेगन का रंग अपने पिता पर पड़ा था । वह धप धप गोरी थी । माँ अफ्रीकन मूल की थी । इसलिए उसका रंग काला था । आम तौर पर गोरे और काले का कम्बिनेशन कम हीं होता है । लेकिन मेगन मार्केल के पिता और माता का कम्बिनेशन बना । दोनों में प्यार पनपा । दोनों ने शादी की । मेगन मार्केल उस शादी के परिणाम स्वरुप इस दुनियां में आई । जब भी मेगन मार्केल अपनी माँ के साथ बाहर निकलती , लोग उसकी माँ को उसकी दाई समझते थे । माँ को दाई समझना मेगन को बहुत पीड़ा देता । एक काली औरत को एक गोरी बेटी की माँ होना लोगों को अचम्भित कर देता । दुनियां में रंगभेद उस समय भी कायम था । आज भी कायम है । कोई खास फर्क नहीं है कल और आज में । मेगन मार्केल को बाॅबी डाॅल से खेलना अच्छा लगता था । पिता से उसने जिद की थी बाॅबी डाॅल लाने की । उसे बाॅबी डाॅल ऐसे परिवार की चाहिए थी , जिसमें पिता गोरा हो , माँ काली हो और डाॅल गोरी हो । पिता ने पूरा मार्केट छान लिया था , पर बाॅबी डाॅल की ऐसा परिवार कहीं नहीं मिला । कहीं पूरा परिवार काला था तो कहीं पूरा परिवार गोरा । कहीं भी हाफ गोरा और हाफ काला बाॅबी ...

छींट के कपड़ों पर बैन लगा था कभी यूरोप में

 छींट हजारों साल पहले से भारत में बनाया जा रहा है । यह एक सूती वस्त्र होता है , जिस पर फूल पत्तियाँ , बेल बूटे काढ़े जाते हैं । पहले भारत की छींट अरब व्यापारियों के मार्फत यूरोप में पहुँचता था । अरबी लोग पहले अपना कमीशन काट  कर तब छींट को युरोपीय लोगों को बेचते थे । ऐसे में छींट महंगी पड़ती थी । छींट को सस्ती करने के लिए समुद्र मार्ग से भारत की खोज की गयी । बास्को डिगामा ने 15वीं शताब्दी में समुद्र मार्ग से भारत के दक्षिणी भाग पर कदम रखा था । वह यहाँ से मसालों और  कपड़ों की पहली खेप लेकर यूरोप पहुँचा था । चूँकि कपड़े कालीकट से ले जाए गए थे , इसलिए इन कपड़ों को कलिको कहा गया । ये कपड़े फूल पत्तियों वाले थे , इसलिए इनके भारतीय नाम छींट की तर्ज पर इन्हें chintz भी कहा गया ।  सुप्रसिद्ध उपन्यासकार जार्ज इलियट ने अपनी बहन को चिट्ठी लिखी थी - " छींटदार कपड़े सबसे अच्छे हैं , पर इनका असर चिंटजी होता है ।"  उस समय तक पूरे यूरोप के बाजारों में ढेर सारे नकली छींट आ गये थे । भारत से भेजे जाने वाले छींट के कपड़े कम पड़ने लगे थे । इसलिए इस कमी को पूरा करने के लिए व्यापारियों ने नकल...

लेफ्टी होने का दर्द

 दुनियां में 10 प्रतिशत लोग लेफ्टी हैं । 3 प्रतिशत क्रास वायर्ड हैं । शेष सभी राईटी हैं । लेफ्टी राईटी का निर्धारण माँ के गर्भ में हीं हो जाता है । यदि किसी के दिमाग का दायां हिस्सा ज्यादा सक्रिय है तो वह लेफ्टी होता है । लेफ्टी होना शरीर की आम प्रक्रिया होती है । यह जेनेटिक , लर्निंग थ्योरी , मस्तिष्क की बनावट और दूसरे अन्यान्य कारणों से भी हो सकती है । इसके लिए जीन भी जिम्मेदार हो सकता है । जीन पर अभी शोध चल रहा है । देर सबेर कोई न कोई नतीजा जरुर निकलेगा। कुछ बच्चे सीखने के दौरान भी लेफ्टी बन जाते हैं । यदि बच्चे का आदर्श कोई लेफ्टी सेलेब्रेटी है तो वह उसी के अनुसार हीं बनना चाहेगा । ऐसे में वह उसी सेलेब्रेटी की तरह महान बनना चाहेगा । वह लेफ्टी बनने की भी कोशिश करेगा । महात्मा गाँधी , बराक ओसामा , अमिताभ बच्चन , बिल गेट्स, रतन टाटा , सचिन तेंदुलकर , ब्रायन लारा , सौरभ गांगुली , निकोल किडमैन , एंजेलिना जाॅनी और करण जौहर ये सभी लेफ्टी थे । गाँधी जी तो दोनों हाथों से लिखते थे । सचिन तेंदुलकर दाएं हाथ के बैट्समैन थे , पर वे लिखा करते थे बाएं हाथ से ।  लेफ्टी लोगों का आई क्यू लेब...

हे चमगादड़ मेरे !

 हे चमगादड़ मेरे ! जब तुम उल्टा लटकते हो तो तुम्हें लगता है कि तुमने पूरी कायनात को पलट दिया है । तुम अपने को केवल सीधा मानते हो । इस बार तो तुमने सचमुच हीं पूरी कायनात पलट दी है । भयंकर तबाही मचा रखी है । लोगों को घरों में कैद कर दिया है । जो बाहर निकलते हैं , वे मास्क पहनकर निकलते हैं । तुम्हारे चलते एक नयी बीमारी ईजाद हुई है । इसे कोरोना कहते हैं । हे चमगादड़ मेरे ! तुम्हारा सूप पीकर जब चाइनीज लोग परमानंद की तृप्ति पा रहे थे । तब उन्हें तुमने उनकी औकात दिखा दी , लेकिन दुःख की बात है कि तुम्हारी दी हुई बीमारी हमारे देश में भी आ गयी । इसका कारण ढूंढने पर पता चला कि तुम एक सामाजिक प्राणी हो । मनुष्यों से तुम्हारी घनिष्टता है । तुम उनके घर के पास के पेड़ों पर उल्टा लटकते हो । किसी बीरान घर को आबाद करते हो । ऐसे में तुम्हारी यह बीमारी भी सामाजिकता से अछूती नहीं रही । हे चमगादड़ मेरे ! कोरोना महामारी की तरह फैल रहा है । इसे सबसे मिलने की बीमारी है । यह बीमारी तुलसीदास की तरह सबसे मिलती जुलती है । इसे भी नर के माध्यम से नारायण से मिलने की जल्दी मची रहती है - तुलसी इस जग में आय के सबसे मिलि...