श्री देव सुमन की क्रांतिकारी गाथा

श्रीदेव सुमन का मूल नाम श्री दत्त बडोनी था । बाद में उनको श्रीदेव सुमन कहा जाने लगा । उनका जन्म 25 मई, 1915 को टिहरी गढ़वाल के जौल गाँव में हुआ था । हांलाकि अंग्रेजों ने टिहरी गढ़वाल पर कब्जा नहीं किया था , पर टिहरी राजघराने ने हमेशा उनकी चाटुकारिता की थी। 1857 के गदर में टिहरी राजघराने ने अंग्रेजों को अपने महलों में शरण दी थी । इसके एवज में अंग्रेजों ने टिहरी राजघराने पर बेशुमार कृपा भी बरसायी थी ।


श्रीदेव सुमन में एक कवि हृदय भी बसता था । उन्होंने 1937 में " सुमन सौरभ " के नाम से अपनी कविताओं का एक संकलन भी निकाला था । श्रीदेव सुमन ने पंजाब विश्विद्यालय से रत्न भूषण, प्रभाकर और बाद में विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षाएँ भी पास की थी । 


श्रीदेव सुमन राजशाही के काले कानूनों के खिलाफ थे । उनका कहना था जंगल,  जमीन और  जल पर सबका हक है । राजशाही इनके इस्तेमाल पर रोक नहीं लगा सकती । ज्ञातव्य हो कि जंगल से एक पत्ता तोड़ने पर भी उस समय टैक्स देना पड़ता था । श्रीदेव सुमन ने 1942 के " भारत छोड़ो " आंदोलन में भी भाग लिया था । उनको भारत के विभिन्न जेलों में लगभग एक साल तक रहना पड़ा था ।


श्रीदेव सुमन भाषण बहुत अच्छा देते थे । वे जब भी बोलते राजशाही के खिलाफ बोलते । ऐसे में राजशाही ने उन पर देश द्रोह का मुकदमा दायर कर दिया । उन्हें टिहरी में भाषण देने पर रोक लगा दी गयी । उन्हें 1943 में  जेल में ठूंस दिया गया । उन्हें अपनी पैरवी करने के लिए टिहरी से बाहर के वकील को लाने पर रोक लगा दी गयी ।


30 दिसम्बर,  1943 से श्रीदेव सुमन जेल में नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे थे । उन्हें जेल में कांच पीसी हुई रोटी खिलाई गयी । 31 जुलाई 1944 को श्रीदेव सुमन को दो साल की सजा हुई  । 200 /- का जुर्माना भी भरना पड़ा । हांलाकि श्रीदेव सुमन को एक राजनीतिक कैदी होना चाहिए था , लेकिन राजशाही ने उनके साथ एक अपराधी की तरह व्यवहार किया। इसके विरोध में उन्होंने 29 फरवरी 1944 को 21 दिन का उपवास शुरू किया था ।


जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो 3 मई, 1944 से श्रीदेव सुमन ने अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया। इस बीच उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन पर कई क्रूर अत्याचार किए गए, लेकिन सुमन अडिग रहे। प्रशासन को यह डर था कि श्रीदेव सुमन की जेल में यदि मृत्यु हो गई तो जनता राजशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ देगी। 


25 जुलाई 1944 को शाम के करीब 4 बजे श्रीदेव सुमन ने अपार कष्ट भोगते हुए अपनी इह लीला समाप्त कर ली थी । अंधेरी रात में श्रीदेव सुमन की लाश को कम्बल में लपेट कर भागीरथी व भिलंगना नदियों के संगम पर तेज प्रवाह में फेंक  दिया गया ।  उनके मरने की खबर दबाकर रखी गयी ।


श्रीदेव सुमन की मौत की खबर किसी तरह से जनता को लग गयी थी । जनता ने विद्रोह कर दिया । जनता ने क्रांति का बिगुल फूंक दिया था । उसका कीर्तिनगर, देव प्रयाग और टिहरी पर अधिकार हो गया । जनता टिहरी को भारतीय संघ के साथ विलय करना चाहती थी । जनता के आगे राजशाही को झुकना पड़ा था । 1949 में मजबूर होकर टिहरी नरेश ने विलय के कागजात पर हस्ताक्षर किए थे ।


आज टिहरी के विशाल जलाशय का नाम ‘श्रीदेव सुमन सागर’ के नाम से जाना जाता है। उनके बलिदान दिवस को उत्तराखंड राज्य में ‘सुमन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड का बच्चा बच्चा उनके त्याग व तपस्या से परिचित है ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आजानुबाहु

बेचारे पेट का सवाल है

ये नयन डरे डरे,,