मोंहिया के माई

 बचपन में मुझे पुआ खाने का बड़ा शौक था । समय असमय का कुछ ख्याल न होता । सिर्फ एक लगन । एक रटन होती । पुआ खाना है । कई बार माँ जल्दी जल्दी में तवा पर बनाना चाहती तो मुझे वह मंजूर नहीं होता । मैं कढ़ाई और छनवटा माँ के सामने  लाकर रख देता । इसी में बनाओ । वैसे तवा पर पुआ नहीं, चोथा पकता है । चोथा खाना किसी भी कीमत पर मुझे मंजूर नहीं था ।

कई बार जब मैं पुआ खाने की जिद नहीं कर रहा होता । खेल में मशगूल होता तो मोंहिया के माई मुझे पुआ खाने की याद दिला देती । वह कहती- 

" आजु पुआ ना खईला हा शंकर दयाल ? "

मुझे पुआ खाने की सुध आ जाती । मेरी इस जिद का तोड़ निकाला गया । एक बुढ़िया घूंघट काढ़े,  चादर ओढ़कर आने लगी । उसके हाथ में एक बड़ा झोला होता । वह झुकी हुई चलती और नक्की स्वर में कहती  -

" बच्चे को इस झोले में डाल दीजिए ।"

माँ मुझे उसके थैले में डालने का उपक्रम करती । मैं कूद फांद कर उसके थैले से दूर जाने की कोशिश करता । फिर मुझसे वादा लिया जाता कि मैं कभी भी पुआ खाने की जिद नहीं करुंगा । मैं वादा करता । मेरी जान छूटती । बाद में पता चला कि वह बुढ़िया भी मोंहिया की माई हीं थी । मतलब पुआ खाने के लिए उकसाने वाली और न खाने के लिए मनाने वाली एक हीं थी ।

मोंहिया के माई धगड़िन का काम करती थी । धगड़िन बच्चा जनाने वाली औरत को कहते थे । वह हमारे बाड़ी में रहती थी ।पूरे बी गार्डेन में वह अकेली दाई थी । वह अपने काम में पूर्ण रुप से सिद्धहस्त थी । उसकी मांग दूर दूर से आती । उसके पति का नाम मुखा था । मुखा गेस्टकीन कम्पनी में काम करते थे । वेतन मिलने वाले दिन वह छककर शराब पीते थे । घर आकर खूब ऊधम मचाते थे । उसके बाद वे पूरे महीना शराब नहीं पीते थे । बाकी बचे पैसे मोंहिया की माई के कब्जे में आ जाते ।

मोंहिया की माई की एक हीं संतान थी । संतान लड़की थी । नाम मोंहिया था । मोंहिया बहुत सुंदर थी । रंग गोरा और नाक नक्श बहुत हीं सुंदर थे । मोंहिया की माई का रंग बहुत दबा हुआ था । वह थुलथुल और मोटी थी । मोंहिया बिल्कुल बाप पर गयी थी । बाप का रंग काफी खुला हुआ था । वे हमेशा पान चबाते व थूकते रहते थे । मोंहिया मुझसे तीन चार साल बड़ी थी ।

जब मेरे बड़े भाई ने मेरा एडमिशन राष्ट्र भाषा विद्यालय में करवाया तो मुझे मोंहिया के हवाले हीं किया था । मोंहिया मेरी पेंसिल छील देती थी । हिंदी की किताब " बाल सखा " मुझे पढ़ाती थी । अक्षर ज्ञान मैं घर से हीं सीख कर गया था । वह कभी कभी मेरे घर भी आती थी । एक दिन उसने मेरी माँ से कहा था - 

"ये हरदम मेरे ऊपर हीं निर्भर रहते हैं  । पेंसिल भी नहीं छील सकते । हमेशा मदद के लिए मेरी तरफ देखते रहते हैं । "

अचानक मोंहिया ने स्कूल जाना बंद कर दिया । वह घर पर हीं रहने लगी । वह काफी गंभीर किस्म की लड़की थी । मैंने कभी उसे हंसते हुए नहीं देखा । पता नहीं कौन सा गम उसे खाए जा रहा था । एक बार मुखा का पूरा परिवार गाँव गया । जब लौटे तो साथ में मोंहिया नहीं आई । पता चला कि उसकी शादी हो गयी है । मोंहिया बड़ी मेधावी छात्रा थी । पढ़ती तो बहुत आगे जाती । शायद उसके उदास होने की यही वजह यही थी कि उसकी पढ़ाई छुड़ा दी गयी थी । उसकी शादी हो जाने के बाद उसकी पढने की इच्छा तो और मर गयी होगी । 

मोंहिया की माई के पास उसका भतीजा आकर रहने लगा था । उसकी पत्नी भी काफी सुंदर थी । भतीजा किसी कारखाने में काम करता था । छुट्टी वाले दिन वह लुंगी व कमीज पहन इधर से उधर घूमा करता । वह काफी शौकिया किस्म का इंसान था ।उसके कई दांत सोने के थे । मुझे कत्तई वह पसंद नहीं था । सफेद दांतों के बीच उसके सोने के पीले दांत बड़े भद्दे लगते । लेकिन वह हमेशा हंसता रहता ताकि लोग उसके सोने के दांत देख सकें ।

मोंहिया के माई की पेशे में अब एक और औरत उतर आई थी । दोनों में गजब की प्रतिस्पर्धा थी । वे एक दूसरे को देखकर छींटा कसी करतीं थीं । दूसरी औरत को लोग " स्वरुप बो " बोलते थे ।एक दिन दोनों औरतों में काफी लड़ाई हुई थी । दोनों एक दूसरे के बाल खींच रहीं थीं । मार रहीं थीं । बड़ी मुश्किल से छुड़ाया गया । अलग होने पर दोनों हांफ रही थी । दोनों में से कोई वहाँ  रुकी नहीं । अपने अपने घरों में चलीं  गयीं थीं । अब झगड़ना उनके वश की बात नहीं रह गयीं थीं । दोनों काफी हद तक थक गयीं थीं ।

एक दिन म्युनिस्पेलिटी के नल पर पानी भरती हुई मोंहिया की माई मिली थी । उस समय तक मैं छठवीं कक्षा का विद्यार्थी हो गया था । मैंने मोंहिया की माई से मोंहिया के बारे में पूछा था । माई ने बताया था कि जब से मोंहिया ससुराल गयी उसने एक चिट्ठी भी नहीं लिखी है । बात करते करते मोंहिया की माई की आंखों में आंसू आ गये थे । मैं दोनों के दर्द को बखूबी समझ रहा था । मोंहिया की माई का दर्द एक माँ का था । मोंहिया का दर्द बाल विवाह और पढ़ाई छुड़ाने का दर्द था । दोनों दर्द अलग अलग थे ।

गेस्टकीन कम्पनी बंद होने के कारण मोंहिया के माई अपने पति मुखा के साथ गाँव चली गयी थी । अब उसके पेशे में भी कोई लज्जत नहीं रह गयी थी । कई प्रतिस्पर्धी आ खड़े हुए थे । वैसे भी लोग हाॅस्पिटल में डिलीवरी कराना अब ज्यादा मुफीद समझने लगे थे ।


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