जिस चीज की चाह है, वो ही बेगानी है.

आप पार्टी से निकाले गये योगेन्द्र यादव ने यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि बुन्देल खण्ड के लोग घास की रोटी खाने पर मजबूर हैं. दरअसल जिसे घास की रोटी कहा जा रहा है, वह मोटा अनाज फिकारा है .फिकारा की खेती बुन्देलखण्ड में सदियों से की जा रही है. फिकारा में प्रचुर मात्रा में आयरन होता है. कृषि वैज्ञानिक डा. अरविन्द का कहना है कि फिकारा वह घास नहीं है, जिसे गाय, भैंस, बकरियां खाती हैं या वह घास भी नहीं हैं, जो आमतौर पर शहरों के पार्कों में और घरों के लानों में रोपा जाता है. फिकारा उस श्रेणी का अनाज है, जो कृषि पंडितों द्वारा अब तलक  आइडेंटिफाइड नहीं किया गया है.
डा. अरविन्द का कहना है कि कुल लगभग 46 हजार वनस्पतियां हैं, जिनमें से मात्र 300/400 हीं आईडेंटिफाइड हैं. जिन बनस्पतियों को हमने ट्रायल किया, जांचा, परखा और खाने के योग्य पाया, उसे अपने भोजन में शामिल किया. जिनके खाने से परेशानी हुई, उसे अपने भोजन से निकाल बाहर किया. खेसारी दाल में विषाक्त तत्व होने के कारण लोगों ने इसे खाना छोड़ दिया,पर आज फिकारा परम्परागत अनाज की श्रेणी में शामिल है और बुन्देलखण्डी लोगों के मुख्य भोजन में शामिल है. इससे अभी तक किसी को कोई परेशानी भी नहीं हुई.
खेतों में कई तरह की कुछ ऐसी उपज हैं , जो बिना हल चलाए, निराई, गुड़ाई, खाद पानी के अस्तित्व में आ जाती हैं. चूंकि परम्परागत अनाज के रूप में इनकी पहचान नहीं बनी है, इसलिए इन्हें खरपतवार व घास की श्रेणी में रख लिया जाता है. आदि काल में सर्वप्रथम धान को भोजन के रूप में मान्यता मिली थी, बरना यह भी घास, खरपतवार हीं था. ज्ञातब्य हो कि गेंहूं के उत्पादन में एक एकड़ एरिया के लिए 63 घंटे सिंचाई की जरूरत पड़ती है, जब कि फिकारा, कुटुकी, कोदो, सांवा, टागुन, ज्वार, बाजरा आदि के लिए सिंचाई की कोई आवश्यकता नहीं होती. मानसून से हीं इनका काम चल जाता है.
फिकार व सांवा जैसे अनाज बुन्देलखण्ड की मंडी में 100 रुपए किलो तक बिकता है. इन अनाजों को किसान आंगन में गड्ढा खोदकर किसी दुर्दिन के लिए दबाकर रख देते हैं. फिकार को सालों साल रखने पर भी यह खराब नहीं होता. इसमें घुन तो बिल्कुल हीं नहीं लगता. इसकी खेती जून माह में की जाती है. मंडी में इसके बीज भी मिलते हैं. इसका भात और रोटी दोनों प्रकार से इस्तेमाल किया जा सकता है. पौष्टिकता के लिहाज से यह गेहूं व चावल से बेहतर है, बेशक स्वाद में कमतर है.
घास की रोटी खाने की बात इसलिए भी उठी कि जहां पत्रकार महोदय पहुंचे थे, उस घर में फिकार के आटा में बथुआ के पत्ते मिलाए गये थे. रंग हरा देखकर पत्रकारों को लगा कि यह घास की रोटी है. इसके अतिरिक्त सनसनी भी फैलानी थी. टी आर पी नाम की चीज भी जेहन में रही होगी. जिन पत्रकारों को गेहूं व धान की किस्मों का पता नहीं, हमेशा पीजा, बर्गर खाने वाले को घास की रोटी का पता कैसे चल गया? जिस फिकार से किसानों का पेट भर रहा है और जो पौष्टिकता से भरपूर है, उसी को पत्रकार लोग किसानों के लिए बेगानी कर दे रहे हैं.
अपनी तो जिन्दगी है, अजीब कहानी है.
जिस चीज की चाह है,  वो ही बेगानी है.
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