स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महानंद मिश्रा

    स्वतंत्रता सेनानी महानंद मिश्रा का जन्म 1911 में बलिया के पुरानी बस्ती में हुआ था । जब उनका घर गंगा के कटान में बह गया तो उनका पूरा परिवार बलिया शहर के जापलिनगंज में आकर रहने लगा । बचपन में हीं उनकी माता का देहावसान हो गया था । उनका पालन पोषण विमाता के हाथों हुआ । 

जब वे किशोर वय के हुए तो घर का खर्च निकालने के लिए माया सिंह ,सी आई डी इंसपेक्टर के घर में कुक की नौकरी करने लगे । इसी दौरान उनकी मुलाकात बागी बलिया के नायक चित्तू पाण्डेय से हुई । चित्तू पाण्डेय से मिलना उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ । वे स्वराज आंदोलन में कूद गये ।

महानंद मिश्रा का जेल का सफर 1927 से शुरू हुआ तो देश की आजादी तक चलता रहा । 1942 का आंदोलन हुआ । पूरे भारत में बलिया हीं ऐसा जिला था जो अंग्रेजों से आजाद हो गया । यह आजादी एक दो दिन की नहीं थी । एक पखवाड़े से ऊपर बलिया आजाद रहा था । महानंद मिश्रा इस आजाद बलिया के प्रथम पुलिस कप्तान चुने गये थे । 

जेल में महानंद मिश्रा को बहुत हीं प्रताड़ित किया गया था । उनकी मूंछे उखाड़ दी गयीं । उन पर कोड़े बरसाए गये । बैरिया थाने के इंचार्ज कुंवर सुंदर सिंह ने तो उनके मुँह में कुप्पी से जबरन पेशाब डाला था । उसी दिन महानंद मिश्र ने ठान लिया था कि वे कुंवर सुंदर सिंह को अपने हाथों मृत्यु दण्ड देंगे । 

कुछेक पुलिस आफिसर ऐसे भी थे , जो महानंद मिश्रा से सहानुभूति रखते थे । उन्हीं में से एक थे दरोगा जुबेर । मिश्रा जी की देशभक्ति का जज्बा देखकर जुबेर ने तय किया था कि वह कभी भी महानंद मिश्र को प्रताड़ित नहीं करेंगे । उनके घर से मिश्रा जी के लिए चुप्पे चोरी खाना आने लगा था । एक और सी आई डी इंसपेक्टर थे त्रिवेणी सिंह , जो महानंद मिश्रा के ऊपर हो रहे अत्याचार से द्रवित हो उठते थे । जब भी महानंद मिश्रा से उनकी आंखें मिलती उनकी आंखों में आंसू हीं नजर आते थे ।

अत्यधिक मार पीट से महानंद मिश्रा को खून की उल्टी भी होने लगी थी । एक दिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ईश्वर तिवारी उनसे मिलने के लिए आए । बीमारी के कारण महानंद मिश्रा बहुत कृशकाय हो चुके थे । ईश्वर तिवारी उन्हें पहचान नहीं पाए । इसलिए चिल्लाकर कहा था -

"  महानंद मिश्रा कौन है ? उनके लिए खुशखबरी है । बैरिया थाना का दरोगा कुंवर सुंदर सिंह मर गया है । उसके दिमाग में कीड़े पड़ गये थे । उसकी बीवी भी भाग गयी है । "

सुनकर महानंद मिश्रा के आंखों के आगे अंधेरा छा गया । कहाँ उन्होंने सोचा था कि कुंवर सुंदर सिंह को अपने हाथों से मृत्युदंड देंगे । कहाँ वह खुद इस दुनियां से रुखसत हो गया ।

चंद्रशेखर ( भूतपूर्व प्रधान मंत्री ) उन दिनों छात्र थे । महानंद मिश्रा उनसे उम्र में काफी बड़े थे । महानंद मिश्रा ने किसी बात पर बहस के दौरान चंद्रशेखर से कह दिया था - 

" कभी कभी अनपढ़ लोगों की बात सुन लिया करो "

महानंद मिश्रा बेशक अनपढ़ थे , लेकिन जिस तरह से स्वराज आंदोलन का नेतृत्व किया वह काबिल ए तारीफ था । वे 1942 के आंदोलन के नायक चित्तू पाण्डेय के बहुत करीबी थे । चंद्रशेखर भी उनका बहुत आदर करते थे । चंद्रशेखर ने स्वीकार किया था कि समाजवाद उन्होंने महानंद मिश्रा से हीं सीखा था ।

9 अक्टूबर 1972 को महानंद मिश्रा जी महाप्रयाण कर गये थे ।

                        - यह लेख  श्री शिवकुमार कौशिकेय की संकलित पुस्तक " क्रांति वीर महानंद मिश्रा " पर आधारित है।

                    - इं एस डी ओझा

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