बकासुर बध कथा.

यह कथा हमने सुख सागर में पढ़ी थी. सुख सागर की कथा प्राचीन ब्रज भाषा है, जिसमें हर कथा की शुरूआत यूं होती है - श्री शुकदेव जी बोलत भयो.
अथ सुख सागर पुराण. श्री शुकदेव जी बोलत भयो. दोपहरी का समय. कृष्ण अपनी गऊओं को पानी पिला वृक्ष की छाया में विश्राम कर रहे थे. कुछ गऊएं चर रहीं थीं. कुछ छाया में बैठ जुगाली कर रहीं थीं .कृष्ण ने बासुरी पर एक पुरानी धुन छेड़ दी. सारा वातावरण संगीतमय हो गया. कहा जाता है कि उस जमाने में कृष्ण के बराबर कोई बासुरी वादक नहीं था. उनकी वासुरी की तान सुन ग्वाल, गोपियां, जड़, चेतन सारे हत्प्रभ हो अपनी सुध बुध खो देते थे.
कुछ वैसा हीं माहौल आज बन रहा था. अचानक यमुना तट की तरफ से एक शोर बरपा. शोर सुन कृष्ण ने बासुरी वादन छोड़ दिया . शोर की तरफ चल पडे़. वहां पहुंच कृष्ण ने देखा एक विशालकाय बगला ,जो गुड़मुड़ अवस्था में बैठा था .कृष्ण को समझते देर न लगी कि वह कंस का भेजा हुआ दैत्य था ,जो सिर्फ और सिर्फ उन्हें मारने के लिए आया था. कृष्ण ने राक्षस की चुनौती स्वीकार की और उसके दोनों चोंच हाथों से पकड़ पांव की मदद लेते हुए उसे बीच से फाड़ दिया. बकासुर का अन्त हो गया. खबर कंस तक पहुँची . कंस को पूर्ण यकीन हो गया कि कृष्ण हीं देवकी का वह आठवाँ बेटा है  ,जिसके हाथों उसकी मौत लिखी हुई है. उसने पुतना, वृतासुर ,बकासुर और अघासुर आदि असुरों को भेजकर कृष्ण को मारने का असफल प्रयास किया.
उधर ग्वाल बालों ने गोकुल जाकर इस घटना को हरेक ग्रामवासी को सुनाया .ग्रामवासियों को पक्का विश्वास हो गया कि कान्हां कोई साधारण बालक नहीं बल्कि भगवान का कोई अवतार है, जो इस पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए अवतरित हुआ है.
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